रजत पंडित, नई दिल्ली गलवानी घाटी घटना के बाद जो कुछ हुआ उससे हम सभी वाकिफ हैं। बातचीत का सिलसिला काफी लंबा चला, जिसके बाद चीनी सैनिक वापस जाने को तैयार हुए और बातचीत का सिलसिला अभी भी जारी है। कुछ इसी तरह की घटना तीन साल पहले 2017 में डोकलाम में हुई थी। टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक, एक महत्वपूर्ण आर्मी पोस्ट जो सेना के ऑपरेशनल काम के लिए बहुत जरूरी है, ब्यूरोक्रैटिक एक्शन के अभाव में अभी तक फाइनल नहीं हो पाया है। के बाद से ही इस पोस्ट की मांग की जा रही थी। रक्षा मंत्रालय से मंजूरी नहीं सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस पोस्ट को लेकर अभी तक रक्षा मंत्रालय के फाइनैंस विंग से मंजूरी नहीं मिली है, जिसके कारण मामला अटका हुआ है। इस पोस्ट का नाम या DCOAS (स्ट्रैटिजी) है। राजनाथ सिंह के सामने पहुंच चुका है प्रस्ताव के आला अधिकारियों ने यह मुद्दा राजनाथ सिंह के सामने भी रखा है। जवानों का कहना है कि ऑपरेशनल कामकाज के लिए इस पोस्ट की सख्त जरूरत है। इस काम से बजट पर कोई असर नहीं होगा और ना ही अडिशनल मैनपावर की जरूरत होगी। DCOAS का पद लेफ्टिनेंट जनरल पोस्ट के बदले में बनाने का सुझाव है। को-ऑर्डिनेशन का काम बहुत आसान हो जाएगा इस पद के निर्माण से सेना के कामकाज आसान हो जाएंगे। खासकर को-ऑर्डिनेशन का काम बहुत आसान हो जाएगा। इस तरह के सिस्टम होने से बड़े पैमाने पर होने वाले किसी भी ऑपरेशनल कामों में परेशानी नहीं होगी। इस पद की कमी डोकलाम घटना के समय महसूस हुई थी। DCOAS की मौजदूगी में आर्मी हेडक्वॉर्टर पर लोड काफी कम होगा।
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